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cwc बालक कल्याण समिति

बालक कल्याण समिति.- (1) राज्य सरकार इस अधिनियम के अन्तर्गत देख-रेख और संरक्षण की आवश्यकता में बालक के संम्बंध में उस समिति पर अधिरोपित या को प्रदान कर्ताव्यों को पूर्ण करने और शक्तियों को प्रयुक्त करने के लिए एक या अधिक बालक कल्यण समिति का [राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारंभ होने की तिथि से एक वर्ष की अवधि के भीतर, प्रत्येक जिले के लिए गठित करेगी।]

(2) समिति में अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होंगे, जैसा राज्य सरकार नियुक्त करने के लिए उपयुक्त समझे, जिसमें से कम एक महिला होगी और अन्य बालकों से संबंधित विशेषज्ञ होंगे।

(3) अध्यक्ष और सदस्यों की अर्हतायें और पदावधि जिसके लिए उनकी नियुक्ति की जा सकेगी, वे होंगी, जिन्हें निर्धारित किया जाये।

(4) समिति के किसी सदस्य की नियुक्ति को राज्य सरकार द्वारा जांच करने के पश्चात् समाप्त की जा सकेगी,यदि-

    (i)उसे इस अधिनियम के अन्तर्गत निहित शक्ति के दुरुपयोग का दोषी पाया जाये,

    (ii)उसे नैतिक अधमता सहित अपराध के लिए दोषसिध्द किया जाये, और उस दोषसिध्दि को उल्टा नहीं किया गया हो या उसे उस अपराध के सम्बंध में पूर्णतया क्षमा नहीं प्रदान की गई,
    (iii)वह किसी मान्य कारण के बिना लगातार तीन महीनों से समिति की कार्यवाहियों में उपस्थित होने में असफल रहा है या वह वर्ष में बैठकों में तीन-चौथाई से भी कम में उपस्थित होने में असफल रहा है।

(5) समिति मजिस्ट्रेटों की न्यायपीठ के रुप में कार्य करेगी और रमिति के पास महानगरीय मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट पर, जो भी स्थिति हो, दण्ड प्रक्रिया संहिता, (1974 का सं. 2) व्दारा प्रदान शक्तियाँ होगी।

समिति के समक्ष प्रस्तुत करना(1)देख-रेख और संरक्षण की आवश्यकता में किसी भी बालक को निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी भी व्यक्ति व्दारा समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकेगा-

i.कोई पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई या नामनिर्दिष्ट पुलिस अधिकारी;

ii. कोई लोक सेवक;

iii.चाइल्डलाइन एक पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन या ऐसे अन्य स्वैच्छि संगठन या एक एजेंसी व्दारा जिसे राज्य सरकार द्वारा अधिकृत किया जाये;

iv. कोई सामारिक कार्यकर्ता या [xxx] लोक भावना वाला नागरिक; या

v.स्वंय बालक द्वारा

[परन्तु बालक को समय की किसी हानि के बिना समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा, लेकिन यात्रा के लिए आवश्यक समय अपवर्जित करते हुए 24 घंटा की अवधि के भीतर प्रस्तुत किया जायेगा|]

(2)राज्य सरकार [X X X] समिति को रिपोर्ट करने के तरीके और जांज लम्बित रहने तक बालक को बाल गृह में भेजने और न्यस्त करने के तरीके के लिए उपबंध करने के लिए इस अधिनियम के साथ संगत नियमों को बना सकती है।

समिति की शक्तियां
(1) समिति बालकों की देख-रेख, संरक्षण, उपचार, विकास और पुनर्वास के साथ-साथ मानवीय अधिकारों के संरक्षण और उनकी आधारभूत आवश्यकताओं को प्रदान करने के मामलों का निपटारा करने की अन्तिम प्राधिकारी होगी।

(2) जहां एक समिति को किसी क्षेत्र के लिए गठित किया गया हो, वहां ऐसी समिति के पास तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि में कुछ भी समाविष्ट होने के बावजूद परंतु इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित को छोड़ते हुए देख-रेख और संरक्षण की आवश्यकता में बालक से संबंधित इस अधिनियम के अन्तर्गत सभी कार्यवाहियों के साथ अनन्यतम कार्य करने की शक्ति होंगी।

Name of the PersonDesignationOfficial AddressMobile NumberEmail Id
Vikas DodrajkaChairperson1st floor Vikas bhawan Sadar Bazar Chaibasa9835708247-------
Vimla HembromMember" "9263846887-------
Jyotsana TirkeyMember" "9199347525-------
Sanjay KumarMember" "8651693373-------
Sumit KumarMember" "9279471986-------

भारत में 430 मिलियन बच्चे )0-18), दुनिया में बच्चों की सबसे बड़ी आबादी है। जबकि इस देश के लिए निस्संदेह यह एक अवसर है जहाँ यह भी सुनिश्चित करने कि जरूरत है कि ये बच्चे दोनों शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य के मामले में स्वस्थपूर्वक आगे बढ़े और उनके लिए देश के विकास में योगदान देने के लिए पर्याप्त अवसर हो। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2001 और 2011 के बीच कुल 48,338 बच्चे के बलात्कार के मामले 336% वृद्धि के साथ [2001(2,113 मामले), 2011)7112 मामले(] दर्ज किए गए। यहां तक कि ये आंकड़े संभवत: संकेतिक है, क्योंकि पुलिस को बच्चों के बलात्कार के अधिकांश मामले सूचित नहीं किए जाते हैं।



 ऐसे माहौल में निस्संदेह बच्चे अधिक कमजोर हो गए हैं, हालाँकि वैसे बच्चे बढ़ती चिंता का विषय है जिसके पास कोई परिवार का सहारा नहीं है। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 20 लाख ऐसे बच्चे हैं।



 यह ब्लॉग बाल देखभाल संस्थानों में ऐसे बच्चों का सेवा करने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचे देखता है। कानून के कई टुकड़े हैं हालांकि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2000 (जेजे एक्ट के रूप में उल्लिखित मुख्य( आधार विधान है। जेजे एक्ट की जरुरत यह है कि बच्चे की प्रत्येक देखभाल संस्था जो बच्चों को आश्रय देती है, एक्ट के तहत पंजीकृत होना चाहिए। इस पंजीकरण का मुख्य उद्देश्य इन संस्थानों के न्यूनतम मानकों को सुनिश्चित करने के लिए और नियमित रूप से उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए है। जबकि क़ानून पुस्तक पर एक और अधिनियम है, अनाथालयों और अन्य धर्मार्थ घर (पर्यवेक्षण और नियंत्रण(अधिनियम 1960, यह इतनी प्रभावी नहीं लगती है क्योंकि इसकी निगरानी एजेंसी "कंट्रोल बोर्ड" राज्य स्तर पर है, जबकि जेजे अधिनियम के तहत CWCs, प्रत्येक जिला स्तर पर स्थापित किया गया है। इसके अलावा जेजे एक्ट बाल देखभाल संस्थानों के साथ-साथ विधि के विरोध में बच्चों को सम्मिलित करते हुए कहीं अधिक व्यापक कानून है।



 भारत में अधिकतम कानूनी उपकरणों के लागू के रूप में समस्या- उनके कार्यान्वयन है। यह सूचना दी गई है कि ज्यादातर बाल देखभाल संस्थानों, पंजीकृत नहीं हैं। अक्सर नौकरशाही देरी के कारण इन बच्चों के संस्थानों के पंजीकरण में देरी होती है। CWCs आवश्यक रूप में इन संस्थानों की दौरा और निगरानी नहीं करती है। इनमें से कई संस्थानों में बच्चों के खिलाफ यौन गालियों की शिकायत दर्ज की गई है, (देखें- मानव अधिकार वॉच की रिपोर्ट, शीर्षक- चुप्पी तोड़कर: भारत में बाल यौन शोषण)

पिछले साल संसद ने बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए एक अधिनियम- POCSO अधिनियम 2012, अधिनियमित किया है। यह अधिनियम कई यौन गालियाँ, संहिताबद्ध किया है और अब आसान मुकदमा चलाने के लिए यह संभव है हालांकि अधिनियम के कार्यान्वयन अधिनियम के तहत आवश्यक रुप में विशेष न्यायालयों की स्थापना पर निर्भर करती है, इसके बिना पुलिस केवल एक ही चीज अथार्त आरोप पत्र दाखिल कर सकती है लेकिन मुकदमा नहीं चला सकती है। इस अधिनियम की कुछ आलोचना भी की गई है यह बताते हुए कि अब अगर एक व्यक्ति एक नाबालिग से शादी करता है तो बलात्कार और अपहरण के आरोपों का सामना करना पड़ सकता है।


BAAL KUNJ
Near:Baal kunj Chaibasa
CHAYA BALIKA GRIH
Near:Kasturba gandhi balika vidyalay Chaibasa

प्रायोजन.- (1) प्रायोजन कार्यक्रमों बालकों के जीवन की गुणवता को बढ़ाने के विचार से उनकी चिकित्सा, पोषाहार, शैक्षणिक और अन्य आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये परिवारों, बाल गृह और विशेष गृह के पूरक समर्थन को प्रदान कर सकता है।

(2) राज्य सरकार बालकों के प्रायोजन की विभिन्न योजनाओं, जैसे व्यक्ति से व्यक्ति प्रायोजन, समूह प्रायोजन या समुदाय प्रायोजन, को पूर्ण करने के प्रायोजनों के लिए नियमों को बना सकती है।

पोषण देख-रेख.- (1) पोषण देख-रेख को उन शिशुओं को अस्थायी स्थानन के लिए प्रयुक्त किया जा सके, जो अंतिम रूप से दत्तक ग्रहण के लिए दिये जाने हैं।

(2) पोषण देख-रेख में, बालक को परिस्थितियों पर निर्भर रहते हुए समय की कम या अधिक अवधि के लिए अन्य परिवार में स्थानित किया जा सकेगा, जहां बालक के स्वयं के माता-पिता पुनर्वास के पश्चात् साधारणतया नियमित रुप से और कभी-कभी आते हो, जहां बालक अपने स्वयं के घरों में आ सकते हैं।

(3) राज्य सरकार बालकों की पोषण देख-रेख कार्यक्रमों की योजना को चलाने के प्रयोजनों के लिये नियमों को बना सकती है।

दत्तक ग्रहण- (1) बालकों को देखरेख और संरक्षण प्रदान करने के लिए प्रारम्भिक जिम्मेदारी उसके परिवार की होगी।

[(2) दत्तक ग्रहण को उन बालकों के पुनर्वास के लिए प्रत्यावर्तित किया जायेगा, जो ऐसी यांत्रिकी के जरिये, जिसे विहित किया जाये अनाथ, परित्यक्त, अभ्यर्पित है।

(3) राज्य सरकार, या केन्द्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन एजेंसी द्वारा और केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित द्वारा, समय-समय पर जारी दत्तक ग्रहण के लिए विभिन्न पथ-प्रदर्शकों के प्रावधानों को रखते हुए बालकों को किये जाने वाले अनुसंधानों से संबंधित स्वयं को संतुष्ट करने के पश्चात् न्यायलय द्वारा दत्तक ग्रहण में दिया जा सकता है, जो दत्तक ग्रहण में ऐसे बालकों को देने के लिए अपेक्षित हो।

(4) राज्य सरकार विशेषकृत दत्तक ग्रहण एजेंसियों के रूप में प्रत्येक जिले में अपनी संस्थाओं या स्वैच्छिक संगठनों में से एक या अधिक को ऐसे तरीके में अधिकृत करेगी, जिसे उप-धारा (3) के अधीन अधिसूचित पथ-प्रदर्शकों की अनुपालना में दत्तक ग्रहण के लिए अनाथ, परित्यक्त या अभ्यर्पित बालकों को रखने के लिए विहित किया जोये;

परंतु राज्य सरकार द्वारा चलाये जा रहे बालक गृह और संस्थाएं या देखरेख तथा संरक्षण की आवश्यकता में बालक के लिए, जो अनाथ, परित्यक्त या अभियर्पित हैं, स्वैच्छिक संगठन यह सुनिश्चत करेंगे कि इन बालकों को समिति द्वारा दत्तक ग्रहण के लिए मुक्त घोषित किया जाता है और ऐसे सभी मामलों को उप-धारा (3) के अधीन अधिसूचित पथ-प्रदर्शकों की अनुपालना में दत्तक ग्रहण में ऐसे बालकों को रखने के लिए उस जिले में दत्तक ग्रहण एजेंसी को निर्दिष्ट किया जायेगा;]

(5)किसी भी बालक को दत्तक ग्रहण के लिए प्रास्तवित नहीं किया जायेगा--

   (a)जब तक कि समिति के दो सदस्य परित्यक्त बच्चों के मामले में स्थानन के लिए विधिक रूप से बालक को स्वतंत्र घोषित नहीं करते,
   (b)माता-पिता द्वारा पुनर्विचार के लिए दो महीनों की अवधि समर्पित बच्चों के मामले में समाप्त नहीं हो जाती, और
   (c)बालक के मामले में उसकी सहमति के बिना, जो उसकी सहमति को समझ और व्यक्त कर सकता है।

[(6) मण्डल किसी बालक को दत्तक ग्रहण में दिये जाने को स्वीकृत कर सकता है--

   (a)वैवाहिकी स्तर के असंबंध व्यक्ति को; या
   (b)अनेक संख्य में जीवित जैव-पुत्र या पुत्रियों से असंबंधित समान लिंग के बालक के दत्तक ग्रहण के माता-पिता को; या
   (c)बालकहीन जोड़े को।]



दत्तक ग्रहण मर्गदर्शन:यहाँ देखे!

यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO अधिनियम) 2012, प्रभावी ढंग से यौन गालियां और यौन शोषण को संबोधित करने के लिए तैयार किया गया था। 19 जून 2012 को राष्ट्रपति से (POCSO अधिनियम) 2012, को मंजूरी मिली और 20 जून, 2012 को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया।



 यह अधिनियम अठारह साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के रूप में एक बच्चे को परिभाषित करता है। यह छेदक और गैर छेदक हमले सहित यौन शोषण के विभिन्न रूपों साथ ही यौन उत्पीड़न और अश्लील साहित्य को परिभाषित करता है। यह यौन उत्पीड़न को निश्चित परिस्थितियों में गंभीर मानती है जैसे- दुर्व्यवहार से पीड़ित बच्चे जब मानसिक रूप से बीमार हो या ऐसे व्यक्ति जैसे परिवार के सदस्य, पुलिस अधिकारी, शिक्षक एवं डॉक्टर के द्वारा दुर्व्यवहार किया गया हो। यह अधिनियम जांच प्रक्रिया के दौरान बच्चे के संरक्षक के रूप में पुलिस को भूमिका देती है। इस प्रकार किसी बच्चे के यौन शोषण की रिपोर्ट प्राप्त पुलिस कर्मियों को इस तरह के बच्चे के लिए आपातकालीन चिकित्सा उपचार उपलब्ध करने और एक आश्रय घर में बच्चे को रखने के रूप में देखभाल और बच्चे की सुरक्षा के लिए तत्काल व्यवस्था करने और CWC के सामने इस मामले को लाने की जिम्मेदारी दी जाती है।



आगे यह अधिनियम, न्यायिक प्रणाली के हाथों में बच्चे की फिर से ज़ुल्म से बचाने के लिए प्रावधान करता है। जितना संभव हो सके यह बच्चे के अनुकूल रूप में बच्चे की पहचान का खुलासा किए बिना विशेष अदालतें प्रदान करता है जो कि बंद-कमरे में सुनवाई का संचालन करता है। इसलिए बच्चे के पास माता पिता या अन्य विश्वसनीय व्यक्ति गवाही के समय उपस्थित हो सकता है और सबूत देते समय एक दुभाषिया, विशेष शिक्षक या अन्य पेशेवर से मदद मांग सकता है। इन सबसे ऊपर यह अधिनियम अपेक्षा करती है कि बच्चे के यौन शोषण का मामला अपराध की सूचना तारीख से एक वर्ष के भीतर निपटाया जाए। यह अधिनियम यौन अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग के लिए भी कदम उठाती है। यह वैसे व्यक्ति पर बच्चे के यौन अपराध रिपोर्ट दर्ज करने करने के लिए कानूनी कर्तव्य डालता है जिसे ज्ञान हो कि बच्चे का यौन शोषण हुआ है; अगर वह ऐसा करने में विफल रहता है तो उसे छह महीने की कैद या कोई जुर्माना से दंडित किया जा सकता है।

बाल श्रम बच्चों के रोजगार को दर्शाता है जो उसे अपने बचपन से वंचित करता है, नियमित स्कूल में भाग लेने के लिए उनकी क्षमता के साथ हस्तक्षेप करता है और यह मानसिक, शारीरिक, सामाजिक एवं नैतिक रूप से खतरनाक और हानिकारक है। यह प्रथा कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा शोषक माना जाता है। दुनिया भर के कानून, बाल श्रम को रोकती है। बाल श्रम के रूप में ये कानूनें बच्चे के सभी कामों पर विचार नहीं करते; अपवाद में- बच्चे कलाकारों के काम, परिवार कर्तव्यों, देखरेख प्रशिक्षण, काम की कुछ विशेष श्रेणियों जैसे अमीष बच्चों द्वारा, स्वदेशी अमेरिकी बच्चों और दूसरों के बीच आम कामों के रूप, शामिल हैं।



बाल श्रम, इतिहास के अधिकांश माध्यम से अलग-अलग विस्तार करने के लिए ही अस्तित्व में है। 19 वीं और 20 वीं सदी के दौरान गरीब परिवारों से 5-14 आयु वर्ग के कई बच्चे यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों के विभिन्न कॉलोनियों में काम करते थे। ये बच्चे मुख्य रूप से कृषि, घर आधारित संयोजन आपरेशन, कारखानों, खनन और समाचार सेवाओं में काम किये। कुछ 12 घंटे तक चलने वाली रात की पाली में भी काम किये। घरेलू आय, स्कूलों और बाल श्रम कानून के पारित होने की उपलब्धता की वृद्धि के साथ, बाल श्रम घटनाओं की दरें गिर गई।



उच्च गरीबी और गरीब स्कूली शिक्षा के अवसरों के साथ विकासशील देशों में बाल श्रम अब भी प्रचलित है। 2010 में कई अफ्रीकी देशों 5-14 आयु वर्ग के 50 प्रतिशत से अधिक काम करते बच्चों की गवाह के साथ, उप-सहारा अफ्रीका में बाल श्रम की सबसे ज्यादा घटनाओं की दरें थी। दुनिया भर में कृषि, बाल श्रम का सबसे बड़ा नियोक्ता है। बाल श्रम की अधिकांश संख्या ग्रामीण हालात और अनौपचारिक शहरी अर्थव्यवस्था में पाया जाता है; बच्चे मुख्य रूप से कारखानों से नहीं बल्कि अपने माता पिता द्वारा नियोजित किये जा रहे हैं। गरीबी और स्कूलों की कमी को बाल श्रम का प्रमुख कारण माना जाता है।



वैश्विक स्तर पर बाल श्रम की घटनाओं में विश्व बैंक के अनुसार 1960 और 2003 के बीच 10% से 25% की कमी हुई है । फिर भी बाल श्रमिकों की कुल संख्या उच्च बनी हुई है, यूनीसेफ और आई.एल.ओ के एक अनुमान के अनुसार 5-17 आयु वर्ग के 168 मिलियन बच्चे दुनिया भर में 2013 में बाल श्रम में शामिल थे।

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DISTRICT CHILD PROTECTION UNIT,
VIKASH BHAWAN,Chaibasa,
West Singhbhum,
Jharkhand

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